ज़ेठ की दोपहर में ज़िन छज़्ज़ों पर इश्क़ की रौनक होती थी, अब वहाँ ग़मग़ीन सन्नाटें का बसेरा हैं ।
Saturday, 29 March 2014
# Micro Poetry 203
कुछ नाम कुरेद कर लिखे गए थे पुरानी मेज पर, कौन कहता है कहानिया सिर्फ़ स्याही से लिखी जाती है .
Thursday, 27 March 2014
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